अनुवाद – आजाद-कथा – भाग 17 – (लेखक – रतननाथ सरशार, अनुवादक – प्रेमचंद)

· June 11, 2012

Premchand_4_aआजाद के दिल में एक दिन समाई कि आज किसी मसजिद में नमाज पढ़े, जुमे का दिन है, जामे-मसजिद में खूब जमाव होगा। फौरन मसजिद में आ पहुँचे। क्या देखते हैं, बड़े-बड़े जहिद और मौलवी,काजी और मुफ्ती बड़े-बड़े अमामे सिर पर बाँधे नमाज पढ़ने चले आ रहे हैं; अभी नमाज शुरू होने में देर है, इसलिए इधर-उधर की बातें करके वक्त काट रहे हैं। दो आदमी एक दरख्त के नीचे बैठे जिन्न और चुड़ैल की बातें कर रहे हैं। एक साहब नवजवान हैं, मोटे-ताजे; दूसरे साहब बुड्ढे हैं, दुबले-पतले।

बुड्ढे – तुम तो दिमाग के कीड़े चाट गए। बड़े बक्की हो। लाखों दफे समझाया कि यह सब ढकोसला है, मगर तुम्हें तो कच्चे घड़े की चढ़ी है, तुम कब सुननेवाले हो।

जवान – आप बुड्ढे हो गए, मगर बच्चों की सी बातें करते हैं। अरे साहब, बड़े-बड़े आलिम, बड़े-बड़े माहिर भूतों के कायल हैं। बुढ़ापे में आपकी अक्ल भी सठिया गई?

बुड्ढे – अगर आप भूत-प्रेत दिखा दें, तो टाँग के रास्ते निकल जाऊँ। मेरी इतनी उम्र हुई, कभी किसी भूत की सूरत न देखी। आप अभी कल के लौंडे हैं, आपने कहाँ देख ली?

जवान – रोज ही देखते हैं जनाब! कौन सा ऐसा मुहल्ला है, जहाँ भूत और चुड़ैल न हों? अभी परसों की बात है, मेरे एक दोस्त ने आधी रात के वक्त दीवार पर एक चुड़ैल देखी। बाल-बाल मोती पिराए हुए, चोटी कमर तक लटकती हुई, ऐसी हंसनी कि परियाँ झख मारें। वह सन्नाटा मारे पड़े रहे, मिनके तक नहीं। मगर आप कहते हैं, झूठ है।

बूड्ढे – जी हाँ झूठ है – सरासर झूठ। हमारा खयाल वह बला है, जो सूरत बना दे, चला-फिरा दे, बातें करते सुना दे। आप क्या जानें, अभी जुमा-जुमा आठ दिन की तो पैदाइश है। और मियाँ, करोड़ बातों की एक बात तो यह है कि मैं बिना देखे न पतियाऊँगा। लोग बात का बतंगड़ और सुई का भाला बना देते हैं। एक सही, तो निन्यानवे झूठ। और आप ऐसे ढुलमुलयकीन आदमियों का तो ठिकाना ही नहीं। जो सुना, फौरन मान लिया। रात को दरख्त की फुनगी पर बंदर देखा और थरथराने लगे कि प्रेत झाँक रहा है। बोले और गला दबोचा। हिले और शामत आई। अँधेरे-धुप में तो यों हो इनसान का जी घबराता है। जो भूत-प्रेत का खयाल जम गया, तो सारी चौकड़ी भूल गए। हाथ-पाँव सब फूल गए। बिल्ली ने म्याऊँ किया और जान निकल गई। चूहे की खड़बड़ सुनी और बिल ढूँढ़ने लगे। अब जो चीज सामने आएगी, प्रेत बन जाएगी। यहाँ सब पापड़ बेल चुके हैं। कई जिन्न हमने उतारे, कई चुड़ैलों से सँभाला। यों गप उड़ाने को कहिए, तो हम भी गप बेपर की उड़ाने लगें। याद रखो, ये ओझे-सयाने सब रँगे सियार हें। सब रोटी कमा खाने के लटके हैं। बंदर न नचाए, मुर्ग न लड़ाए, पतंग न उड़ाए, भूत-प्रेत ही झाड़ने लगे।

जवान – खैर, इस तू-तू मैं-मैं से क्या वास्ता? चलिए हमारे साथ। कोई दो-तीन कोस के फासले पर एक गाँव है, वहाँ एक साहब रहते हैं। अगर आपकी खोपड़ी पर उनके अमल से भूत न चढ़ बैठे, तो मूँछ मुड़वा डालूँ। कहिएगा, शरीफ नहीं चमार है। बस, अब चलिए, आपने तो जहाँ जरा सी चढ़ाई और कहने लगे कि पीर, पयंबर, देवी, देवता, भूत-प्रेत सब ढकोसला है। लेकिन आज ठीक बनाए जाइएगा।

यह कह कर दोनों उसे गाँव की तरफ चले। मियाँ आजाद तो दुनिया भर के बेफिक्रे थे ही, शौक चर्राया कि चलो, सैर देख आओ। यह भी पुराने खयालों के जानी दुश्मन थे। कहाँ तो नमाज पढ़ने मसजिद आए थे, कहाँ छू-छक्का देखने का शौक हुआ; मसजिद को दूर ही से सलाम किया और सीधे सराय चले। अरे, कोई इक्का किराए का होगा? अरे मियाँ, कोई भठियारा इक्का भाड़े करेगा?

भठियारा – जी हाँ, कहाँ जाइएगा?

आजाद – सकजमलदीपुर।

भठियारा – क्या दीजिएगा?

आजाद – पहले घोड़ा-इक्का तो देखें – ‘घर घोड़ा नखास मोल!”

भठियारा – वह क्या कमानीदार इक्का खड़ा है और यह सुरंग घोड़ी है, हवा से बातें करती जाती है; बैठे और दन से पहुँचे।

इक्का तैयार हुआ। आजाद चले, तो रास्ते में एक साहब से पूछा – क्यों साहब, इस गाँव को सकजमलदीपुर क्यों कहते हैं?कुछ अजीब बेढंग सा नाम है। उसने कहा – इसका बड़ा किस्सा है। एक साहब शेख जमालुद्दीन थे। उन्होंने गाँव बसाया और इसका नाम रक्खा शेखजमालुद्दीनपुरा। गँवार आदमी क्या जाने, उन्होंने शेख का सक, जमाल का जमल और उद्दीन का दी बना दिया।

इक्केवाले से बातें होने लगीं। इक्केवाला बोला – हुजूर, अब रोजगार कहाँ! सुबह से शाम तक जो मिला, खा-पी बराबर। एक रुपया जानवर खा गया, दस-बारह आने घर के खर्च में आए, आने दो आने सुलफे-तमाखू में उड़ गए। फिर मोची के मोची। महाजन के पचीस रुपए छह महीने से बेबाक न हुए। जो कहीं कच्ची में चार-पाँच कोस ले गए, तो पुट्ठियाँ धँस गईं पैंजनी, हाल, धुरा सब निकल गया। दो-चार रुपए के मत्थे गई। रोजगार तो तुम्हारी सलामती से तब हो, जब यह रेल उड़ जाय। देखिए, आप ही ने सात गंडे जमलदीपुर के दिए, मगर तीन चक्कर लगा कर।

कोई पौने दो घंटे में आजाद सकजमलदीपुर पहुँचे। पता-वता तो इनको मालूम था ही, सीधे शाह साहब के मकान पर पहुँचे। ठट के ठट आदमी जमा थे। औरत-मर्द टूटे पड़ते थे। एक आदमी से उन्होंने पूछा – क्या आज यहाँ कोई मेला है? उसने कहा – मेला-वेला नाहीं, एक मनई के मूड़ पर देवी आई हैं, तौन मेहरारू, मनसेधू सब देखै आवत हैं। इसी झुंड में आजाद को वह बूढ़े मियाँ भी मिल गए, जो भूत-चुड़ैल को ढकोसला कहा करते थे। अकेले एक तरफ ले जा कर कहा – जनाब, मैंने मसजिद में आपकी बातें सुनी थीं। कसम खाता हूँ, जो कभी भूत-प्रेत का कायल हुआ हूँ। अब ऐसी कुछ तदबीर करनी चाहिए कि इन शाह साहब की कलई खुल जाय।

इतने में शाह साहब नीले रंग का तहमद बाँधे, लंबे-लंबे बालों में हिना का तेल डाले, माँग निकाले, खड़ाऊँ पहने तशरीफ लाए। आँखों में तेज भरा हुआ था। जिसकी तरफ नफर भर कर देखा, वही काँप उठा। किसी ने कदम लिए, किसी ने झुक कर सलाम किया। शाह साहब ने गुल मचाना शुरू किया – धूनी मेरी जलती है, जलती है और बलती है, धूनी मेरी जलती है। खड़ी मूँछोंवाला है, लंबे केसूवाला है, मेरा दरजा आला है। झूम-झूम कर जब उन्होंने यह आवाज लगाई तो सब लोग सन्नाटे में आ गए। एकाएक आपने अकड़ कर कहा – किसी को दावा हो, तो आ कर मुझसे कुश्ती लड़े। हाथी को टक्कर दूँ, तो चिग्घाड़ कर भागे; कौन आता है?

अब सुनिए, पहले से एक आदमी को सिखा-पढ़ा रखा था। वह तो सधा हुआ था ही, झट सामने आकर खड़ा हो गया और बोला – हम लड़ेंगे। बड़ा कड़ियल जवान था; गैंडे की सी गर्दन, शेर का सा सीना; मगर शाह साहब की तो हवा बँधी हुई थी। लोग उस पहलवान की हालत पर अफसोस करते थे कि बेधा है; शाह साहब चुटकियों में चुर्र-मुर्र कर डालेंगे।

खैर दोनों आमने-सामने आए और शाह साहब ने गरदन पकड़ते ही इतनी जोर से पटका कि वह बेहोश हो गया। आजाद ने बूढ़े मियाँ से कहा – जनाब, यह मिली भगत है। इसी तरह गँवार लोग मूड़े जाते हैं। मैं ऐसे मक्कारों की कब्र तक से वाकिफ हूँ। ये बाते हो ही रही थीं कि शाह साहब ने फिर अकड़ते हुए आवाज लगाई – कोई और जोर लगाएगा? मियाँ आजाद ने आव देखा न ताव, झट लँगोट बाँध; चट से कूद पड़े। आओ उस्ताद; एक पकड़ हमसे भी हो जाय। तब तो शाह साहब चकराए कि यह अच्छे बिगड़े दिल मिले। पूछा – आप अंगरेजी पढ़े हैं? आजाद ने कड़क कर कहा – अंगरेजी नहीं, अंगरेजी का बाप पढ़ा हूँ। बस, अब सँभलिए, मैं आ गया। यह कह कर, घुटना टेक कलाजंग के पेच पर मारा, तो शाह साहब चारों खाने चित जमीन पर धम से गिरे। इनका गिरना था कि मियाँ आजाद छाती पर चढ़ बैठे। अब बताओ बच्चा, काट लूँ नाक, कतर लूँ कान, बाँधू दुम में नमदा! बदमाश कहीं का! बूढ़े मियाँ ने झपट कर आजाद को गोद में उठा लिया। वाह उस्ताद, क्यों न हो। शाह साहब उसी दिन गाँव छोड़ कर भागे।

शाह साहब को पटकनी दे कर और गाँव के दुलमुल-यकीन गँवारों को समझा-बुझा कर आजाद बूढ़े मियाँ के साथ-साथ शहर की तरफ चल खड़े हुए। रास्ते में उन्हीं शाह साहब की बातें होने लगीं –

आजाद – क्यों, सच कहिएगा, कैसा अड़ंगा दिया? बहुत बिलबिला रहे थे। यहाँ उस्तादों की आँखें देखी हैं। पोर-पोर में पेंचैती कूट-कूट कर भरी है। एक-एक पेंच के दो-दो सौ तोड़ याद हैं। मैं तो उसे देखते ही भाँप गया कि यह बना हुआ है। लड़ेतिए का तो कैड़ा ही उसका न था। गरदन मोटी नहीं, छाती चौड़ी नहीं, बदन कटा-पिटा नहीं, कान टूटे नहीं। ताड़ गया कि घामड़ है। गरदन पकड़ते ही दबा बैठा।

बूढ़े मियाँ – अब इस गाँव में भूल कर भी न आएगा। एक मर्तबा का जिक्र सुनिए, एक बने हुए सिद्ध पलथी मार कर बैठे और लगे अकड़ने की कोई छिपा कर हाथ में फूल ले, हम चुटकियों में बता देंगे। मेरे बदन में आग लग गई मैंने कहा – अच्छा, मैंने फूल लिया, आप बतलाइए तो सही। पहले तो आँखें नीली-पीली करके मुझे डराने लगे। मैंने कहा – हजरत; मैं इन गीदड़-भभकियों में नहीं आने का। यह पुतलियों का तमाशा किसी नादान को दिखाओ। बस, बताओ, मेरे हाथ में क्या है? थोड़ी दूर तक सोच-सोच कर बोले – पीला फूल है। मैंने कहा – बिलकुल झूठ। तब तो घबराए और कहने लगे – मुझे धोखा हुआ। पीला नहीं, हरा फूल है। मैंने कहा – वाह भाई लालबुझक्कड़ क्यों न हो! हरा फूल आज तक देखा न सुना, यह नया गुल खिला। मेरा यह कहना था कि उनका गुलाब सा चेहरा कुम्हला गया। कोई उस वक्त उनकी बेकली देखता। मैं जामे में फूला न समाता था। आखिर इतने शरमिंदा हुए कि वहाँ से पत्तातोड़ भागे। हम ये सब खेल खेले हुए हैं।

आजाद – ऐसे ही एक शाह साहब को मैंने भी ठीक किया था। एक दोस्त के घर गया, तो क्या देखता हूँ कि एक फकीर साहब शान से बैठे हुए हैं और अच्छे-अच्छे, पढ़े-लिखे आदमी उन्हें घेरे खड़े हैं। मैंने पूछा – आपकी तारीफ कीजिए, तो एक साहब ने, जो उस पर ईमान ला चुके थे, दबे दाँतों कहा – शाह साहब गैबदाँ (त्रिकालदर्शी) हैं। आपके कमालों के झंडे गड़े हुए हैं। दस-पाँच ने तो उन्हें आसमान ही पर चढ़ा दिया। मैंने दिल में कहा – बचा, तुम्हारी खबर न ली, तो कुछ न किया। पूछा, क्यों शाह जी, यह तो बताइए, हमारे घर में लड़का कब तक होगा? शाह जी समझे, यह भी निरे चोंगा ही हैं। चलो, अनाप-सनाप बता कर उल्लू बनाओ और कुछ ले मरो। मेरे बाप, दादे और उनके बाप के परदादे का नाम पूछा। यहाँ याद का यह हाल है कि बाप का नाम तो याद रहता है, दादाजान का नाम किस गधे को याद हो। मगर खैर, जो जबान पर आया, ऊल-जलूल बता दिया। तब फर्माते क्या हैं, बच्चा दो महीने के अंदर ही अंदर बेटा ले। मैंने कहा – हैं शाह साहब, जरा सँभले हुए। अब तो कहा, अब न कहिएगा। पंद्रह दिन तो बंदे की शादी को हुए और आप फर्माते हैं कि दो महीने के अंदर ही अंदर लड़का ले। वल्लाह, दूसरा कहता, खून पी लेता। इस फिकरे पर यार लोग खिलखिला कर हँस पड़े और शाह जी के हवास गायब हो गए। दिल में तो करोड़ों की गालियाँ दी होंगी, मगर मेरे सामने एक न चली। जनाब, उस दयार में लोग उन्हें खुदा समझते थे। शाह जी कभी रुपए बरसाते थे, कभी बेफस्ल के मेवे मँगवाते थे, कभी घड़े को चकनाचूर करके फिर जोड़ देते थे। सैकड़ों ही अलसेंटे याद थी, मेरा जवाब सुना, तो हक्का-बक्का हो गए। ऐसे भागे कि पीछे फिर कर भी न देखा। जहाँ मैं हूँ, भला किसी सिद्ध या शाह जी का रंग जम तो जाय।

यही बातें करते हुए लोग फिर अपने-अपने घर सिधारे।

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