अनुवाद – आजाद-कथा – भाग 15 – (लेखक – रतननाथ सरशार, अनुवादक – प्रेमचंद)

· June 13, 2012

Premchand_4_aमियाँ आजाद एक दिन चले जाते थे। क्या देखते हैं, एक पुरानी-धुरानी गड़हिया के किनारे एक दढ़ियल बैठे काई की कैफियत देख रहे हैं।कभी ढेला उठाकर फेंका, छप। बुड्ढे आदमी और लौंडे बने जाते हैं। दाढ़ी का भी खयाल नहीं। लुत्फ यह कि मुहल्ले भर के लौंडे इर्द-गिर्द खड़े तालियाँ बजा रहे हैं, लेकिन आप गड़हिया की लहरों ही पर लट्टू हैं। कमर झुकाए चारों तरफ ढेले और ठीकरे ढूँढ़ते फिरते हैं। एक दफा कई ढेले उठा कर फेंके। आजाद ने सोचा, कोई पागल है क्या। साफ-सुथरे कपड़े पहने, यह उम्र, यह वजा, और किस मजे से गड़हिया पर बैठे रँगरलियाँ मना रहे हैं। यह खबर नहीं कि गाँव भर के लौंडे पीछे तालियाँ बजा रहे हें। एक लौंडे ने चपत जमाने के लिए हाथ उठाया, मगर हाथ खींच लिया। दूसरे ने पेड़ की आड़ से कंकड़ी लगाई। तीसरे ने दाढ़ी पर घास फेंकी। चौथे ने कहा – मियाँ, तुम्हारी दाढ़ी में तिनका; मगर मेरा शेर जरा न मिनका। गड़हिया से उठे, तो दूर की सूझी। झप से एक पेड़ पर चढ़ गए, फुनगी पर जा बैठे और बंदर की तरह लगे उचकने। उस टहनी पर से उचके, तो दूसरी डाल पर जा बैठे। उस पर लड़कों को भी बुलाते जाते हैं कि आओ, ऊपर आओ। इमली का दरख्त था, इतना ऊँचा कि आसमान से बातें कर रहा था। हजरत मजे से बैठे इमली खाते और चिएँ लड़कों पर फेंकते जाते हैं। लौंडे गुल मचा रहे हैं कि मियाँ, मियाँ, एक चियाँ हमको इधर फेंको, इधर; हाथ ही टूटे, जो उधर फेंके। क्या मजे से गपर-गपर करके खाते जाते हैं, इधर एक चियाँ भी नहीं फेंकते। ओ कंजूस, ओ मक्खीचूस, ओ बंदर, अरे मुछंदर, एक इधर भी। थोड़ी देर में खटखट करते पेड़ से उतरे। इतने में कमसरियट के तीन-चार हाथी चारे और गन्ने से लदे झूमते हुए निकले। आपने लड़कों को सिखाया कि गुल मचा कर कहो – हाथी, हाथी गन्ना दे। लौंड़ो ने जो इतनी शह पाई, तो आसमान सिर पर उठा लिया। सब चीखने लगे – हाथी, हाथी, गन्ना दे। एकाएक एक रीछ वाला आ निकला। आपने झट रीछ की गरदन पकड़ी और पीठ पर हो रहे। टिक-टिक-टिक, क्या टट्टू है! रीछवाला चिल्ल-पों मचाया ही किया, आपने दो-तीन लड़कों को आगे-पीछे अगल-बगल बिठा ही लिया। मजे से तने बैठे हैं, गोया अपने वक्त के बादशाह हैं। थोड़ी देर के बाद लड़कों को जमीन पर पटका, खुद भी धम से जमीन पर कूद पड़े, और झट लँगोट कस, ताल ठोक, रीछ से कुश्ती लड़ने पर आमादा हो गए। तब तो रीछवाला चिल्लाया – मियाँ, क्यों जान के दुश्मन हुए हो! चबा ही डालेगा। यह तो हवा के घोड़े पर सवार थे, आव देखा न ताव, चिमट ही तो गए और एक अंटी बताई तो रीछ चारों खाने चित। लौडों ने वह गुल मचाया कि रीछ पूरब भागा, और रीछवाला पश्चिम। मुहल्ले भर में कहकहा उड़ने लगा। थोड़ी ही देर के बाद एक भड्डरी आ निकला। धोती बाँधे, पोथी बगल में दबाए, रुद्राक्ष की माला पहने, आवाज लगाता जाता है – साइत बिचारे, सगुन बिचारे। दढ़ियल के करीब से गुजरा, तो शिकार इनके हाथ आया। बोले – भई, इधर आना। उसकी बाँछें खिल गईं कि पौ बारह है। अच्छी बोहनी हुई। दढ़ियल ने हाथ दिखाया और पूछा – हमारी कितनी शादियाँ होंगी? उसने कन्या, मकर, सिंह, वृश्चिक करके बहुत सोच के कहा – पाँच। आपने उसकी पगड़ी उछाल दी। लड़कों को दिल्लगी सूझी, किसी ने सिर सुहलाया तो किसी ने चपत लगाया। अच्छी तरह बोहनी हुई। दढ़ियल ने कहा – सच कहना, आज साइत देख कर चले थे या यों ही? अपनी साइत देख लेते हो या औरों ही की राह बताते हो? अच्छा, खैर, बताओ, हमारे यहाँ लड़का कब तक होगा? भड्डरी ने कहा – बस, बस, आप और किसी से पूछिएगा। भर पाया। यह कह कर चलने ही को था कि दढ़ियल ने लड़कों को इशारा किया। वे तो इनको अपना गुरू ही समझते थे। एक ने पोथी ली, दूसरे ने माला छिपाई, तीसरे ने पगिया टहला दी। दस-पाँच चिमट गए। बेचारा बड़ी मुश्किल से जान छुड़ा कर भागा और कसम खाई कि अब इस मुहल्ले में कदम न रखूँगा। इतने में खोंचेवाले ने आवाज दी – गुलाबी रेवड़ियाँ, करारी खुटियाँ, दालमोट सलोने, मटर तिकोने। लौंडे अपने-अपने दिल में खुश हो गए कि दढ़ियल के हुक्म से खोंचा लूट लेंगे ओर खूब मिठाइयाँ चखेंगे। मगर उन्होंने मना कर दिया – खबरदार, हाथ मत बढ़ाना। जब खोंचेवाला पास आया, तब उन्होंने मोल-तोल करके दो रुपए में सारा खोंचा मोल ले लिया और लड़कों को खूब छका कर खिलाया। एक दस मिनट के बाद आवाज आई – खीरे लो, खीरे। आपने उचक कर टोकरा उलट दिया। खीरे जमीन पर गिर पड़े। जैसे ही लड़कों ने चाहा, खीरे बटोरें कि उन्होंने डाँट बताई। खीरेवाले के दोनों हाथ पकड़ लिए और लड़कों से कहा – खीरे उठा उठाकर इसी गड़हिया में फेंकते जाओ। पचास-साठ खीरे आनन-फानन गड़हिया में पहुँच गए। अभी यह तमाशा हो ही रहा था कि एक चिड़ीमार कंपा-जाल लिए हुए आ निकला। हाथ में तीन-चार जानवर, कुछ झोले के अंदर। सब फड़फड़ा रहे हैं। कहता जाता है – काला भुजंगा मंगल के रोज। दढ़ियल ने पुकारा – आओ मियाँ, इधर आओ। एक भुजंगा ले कर अपने ऊपर से उतार कर छोड़ दिया। चिड़मार ने कहा – टका हुआ। दूसरा जानवर एक लड़के पर से उतार कर छोड़ा। इसी तरह दस-पंद्रह चिड़ियाँ छोड़ कर चुपचाप खड़े हो गए। गोया कुछ मतलब ही नहीं। चिड़ीमार ने कहा – हुजूर, दाम। आपने फर्माया – तुम्हारा नाम? तब तो वह चकराया कि अच्छे मिले। बोला – हुजूर, धेली के जानवर थे। आप बोले – कैसी धेली और कैसा धेला! कुछ घास तो नहीं खा गया? भंग पी गया है या शराब का नशा है? इधर लड़कों ने जाल कंपा सब टहला दिया। थोड़ी देर रो-पीट कर उसने भी अपनी राह ली।

दढ़ियल ने लड़कों को छोड़ा और वहाँ से किसी तरफ जाना ही चाहते थे कि आजाद ने करीब आ कर पूछा – हजरत, मैं बड़ी देर से आपका तमाशा देख रहा हूँ, कभी खीरे गड़हिया में फेंके, कभी इमली पर उचक रहे, कभी चिड़ीमार की खबर ली, कभी भड्डरी को आड़े हाथों लिखा। मुझे खौफ है कि आप कहीं पागल न हो जाएँ, जल्दी फस्द खुलवाइए।

दढ़ियल मुझे तो आप ही पागल मालूम होते हैं। इन बातों के समझने के लिए बड़ी अक्ल चाहिए। सुनिए, आपको समझाऊँ। गड़हिया पर बिस्तर जमा कर ढेले फेंकने और पेड़ पर उचक कर इमली खाने और हाथी से गन्ने माँगने का सबब यह है कि लौंडे भी हमारी देखा-देखी उचक-फाँद में बर्क हो जाएँ, यह नहीं कि मरियल टट्टू की तरह जहाँ बेठे, वहीं जम गए। लड़कों को कम से कम दो घंटे रोज खेलना-कूदना चाहिए, वरना बीमारी सताएगी। रीछ वाले के रीछ पर उचक बैठने, रीछ को भगा दे और चिड़ीमार के जानवरों को मुफ्त बे कौड़ी-बेदाम छुड़ा देने का सबब यह है कि जब हम जानवरों को तकलीफ में देखते हैं, तो कलेजे पर साँप लोटने लगता है और इन चिड़िमारों का तो मैं जानी दुश्मन हूँ। बस चले, तो कालेपानी भिजवा दूँ। जहाँ देखा, कि दो चार भले मानुस खड़े हैं, लगे जानवरों को जोर से दबाने, जिसमें वे चीखें, और लोग उनकी हालत पर कुछ दे निकलें, इनकी हड्डियाँ चढ़ जायँ। खीरे इसलिए गड़हिया में फिकवा दिए कि आजकल हवा खराब है, खीरे खाने से भला-चंगा आदमी बीमार हो जाय। मगर इन कुँजड़ों-कबाड़ियों को इन बातों से क्या वास्ता? उन्हें तो अपने टकों से मतलब! मैंने समझा, एक कबाड़िए के नुकसान से पचासों आदमियों की जान बच जाय, तो क्या बुरा? देख लो, खोंचेवाले को हमने अपने पास से दो रुपए खनाखन गिन दिए। अब समझे, इस तमाशे का हाल?

यह कह कर उन्होंने अपनी राह ली और आजाद ने भी दिल में उनकी नेकनीयती की तारीफ करते हुए दूसरी तरफ का रास्ता लिया। अभी कुछ ही दूर गए थे कि सामने से एक साहब आते हुए दिखाई दिए। उन्होंने आजाद से पूछा – क्यों साहब, आप अफीम तो नहीं खाते?

आजाद – अफीम पर खुदा की मार! कसम ले लीजिए, जो आज तक हाथ से भी छुई हो। इसके नाम से नफरत है।

यह कह कर आजाद नदी के किनारे जा बैठे। वहाँ से पलट कर जो आए, तो क्या देखते हैं कि वही हजरत जमीन पर पड़े आँखें माँग रहे हैं। चेहरे पर मुर्दनी छाई है, होंठ सूख रहे हैं, आँखों से आँसू बह रहे हैं। न सिर की फिक्र है, न पाँव की। आजाद चकराए, क्या माजरा है। पूछा – क्यों भई, खैर तो है? अभी तो भले-चंगे थे, इतनी जल्द कायापलट कैसे हो गई?

अफीमची – भई, मैं तो मर मिटा। कहीं से अफीम ले आओ। पिऊँ, तो आँखें खुलें; जान में जान आए। छुटपन ही से अफीम का आदी हूँ। वक्त पर न मिले, तो जान निकल जाय।

आजाद – अरे यार, अफीम छोड़ो, नहीं इसी तरह एक दिन दम निकल जाएगा।

अफीमची – तो क्या आप अमृत पी कर आए हैं? मरना तो एक दिन सभी को है।

आजाद – मियाँ, हो बड़े तीखे; ‘रस्सी जल गई, मगर बल न गया।’ पड़े सिसक रहे हो, मगर जवाब, तुर्की ब तुर्की जरूर दोगे।

अफीमची – जनाब, अफीम लानी हो तो लाइए, वर्ना यहाँ बक-बक सुनने का दिमाग नहीं।

आजाद – अफीम लानेवाले कोई और ही होंगे, हम तो इस फिक्र में बैठे हैं कि आप मरें, तो मातम करें। हाँ, एक बात मानो तो अभी लपक जाऊँ, जरा लकड़ी के सहारे से उस हरे-भरे पेड़ के तले चलो; वहाँ हरी-हरी घास पर लोट मारो; ठंडी-ठंडी हवा खाओ, तब तक मैं आता हूँ।

अफीमची – अरे मियाँ, यहाँ जान भारी है। चलना-फिरना उठना-बैठना कैसा!

आखिर आजाद ने उन्हें पीठ पर लादा और ले चले। उनकी यह हालत कि आँखें बंद, मुँह खुला हुआ; मालूम ही नहीं कि जाते कहाँ हैं। आजाद ने उनको नदी में ले जा कर गोता दिया। बस कयामत आ गई। अफीमची आदमी, पानी की सूरत से नफरत, लगे चिल्लाने – बड़ा गच्चा दे गया, मारा, पटरा कर दिया! उम्र भर में आज ही नदी में कदम रखा; खुदा तुमसे समझे; सन से जान निकल गई ठिठुर गया; अरे जालिम, अब तो रहम कर। आजाद ने एक गोता और दिया। फिर ताबड़तोब कई गोते दिए। अब उनकी कैफियत कुछ न पूछिए। करोड़ों गालियाँ दी। आजाद ने उनको रेती में छोड़ दिया और लंबे हुए। चलते-चलते एक बरगद के पेड़ के नीचे पहुँचे, जिसकी टहनियाँ आसमान से बातें करती थीं और जटाएँ पाताल की खबर लेती थीं। देखा, एक हजरत नशे में चूर एक दुबली-पतली टटुई पर सवार टिक-टिक करते जा रहे हैं।

आजाद – इस टटुई पर कौन लदा है?

शराबी – अच्छा जी, कौन लदा है! ऐसा न हो कि कहीं मैं उतर कर अंजर-पंजर ढीले कर दूँ। यों नहीं पूछता कि इस हवाई घोड़े पर आसन जमाए, बाग उठो कौन सवार जाता है। आँखों के आगे नाक, सूझे क्या खाक। टट्टू ऐसे ही हुआ करते हैं?

आजाद – जनाब, कसूर हुआ, माफ कीजिए। सचमुच यह तो तुर्की नस्ल का पूरा घोड़ा है। खुदा झूठ न बुलाए, जमना पार की बकरी इससे कुछ ही बड़ी होगी।

शराबी – हाँ, अब आप आए राह पर। इस घोड़े की कुछ न पूछिए। माँ के पेट से फुदकता निकला था।

आजाद – जी हाँ, वह तो इसकी आँखें ही कहे देती हैं। घोड़ा क्या उड़न-खटोला है।

शराबी – इसकी कीमत भी आपको मालूम है?

आजाद – ना साहब! भला मैं क्या जानूँ। आप तो खैर गधे पर सवार हुए हैं, यहाँ तो टाँगों की सवारी के सिवा और कोई सवारी मयस्सर ही न हुई। मगर उस्ताद कितनी ही तारीफ करो, मेरी निगाह में तो नहीं जँचता।

शराबी – अच्छा, तो इसी बात पर कड़कड़ाए देता हूँ।

यह कह कर एड़ लगाई मगर टट्टू ने जुंबिश तक न की। वह और अचल हो गया। अब चाबुक पर चाबुक मारते हैं, एड़ लगाते हैं और वह टसकने का नाम तक नहीं लेता। आजाद ने कहा – बस ज्यादा शेखी में न आइए, ठंडी-ठंडी हवा खाइए।

यह कह कर आजाद तो चले, मगर शराबी के पाँव डगमगाने लगे। बाग अब छूटी और अब छूटी। दस कदम चले और बाग रोक ली। पूछा – मियाँ मुसाफिर, मैं नशे में तो नहीं हूँ?

आजाद – जी नहीं, नशा कैसा? आप होश की बातें कर रहे हैं?

शराबी इसी तरह बार-बार आजाद से पूछता था। आखिर जब आजाद ने देखा कि यह अब घुड़िया पर से लुढ़कना ही चाहते हैं, तो झट घुड़िया को एक खेत में हाँक दिया, और गुल मचाया कि ओ किसान, देख यह तेरा खेत चराए लेता है। किसान के मान में भनक पड़ी, तो लठ काँधे पर रख लाखों गालियाँ देता हुआ झपटा। आज चचा बना के छोड़ूँगा; रोज सुअरिया चरा ले जाते थे, आज बहुत दिन के बाद हत्थे चढ़े हो। नजदीक गया, तो देखता है कि टटुई है और एक आदमी उस पर लदा है। किसान चालाक था। बोला – आप हैं बाबू साहब! चलिए, आपको घर ले चलूँ। वहीं खाना खाइए और आराम से सोइए। वह कह कर घुड़िया की रास थामे हुए, काँजी हाऊस पहुँचा और टटुई को काँजी हाऊस में ढकेल कर चंपत हुआ। यह बेचारे रात भर काँजी हाऊस में रहे, सुबह को किसी तरह घर पहुँचे।

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