अनुवाद – आजाद-कथा – भाग 13 – (लेखक – रतननाथ सरशार, अनुवादक – प्रेमचंद)

· June 15, 2012

Premchand_4_aइधर शिवाले का घंटा बजा ठनाठन, उधर दो नाकों से सुबह की तोप दगी दनादन। मियाँ आजाद अपने एक दोस्त के साथ सैर करते हुए बस्ती के बाहर जा पहुँचे। क्या देखते हैं, एक बेल-बूटों से सजा हुआ बँगला है। अहाता साफ, कहीं गंदगी का नाम नहीं। फूलों-फलों से लदे हुए दरख्त खड़े झूम रहे हें। दरवाजों पर चिकें पड़ी हुई हैं। बरामदे में एक साहब कुर्सी पर बैठे हुए हैं, और उनके करीब दूसरी कुर्सी पर उनकी मेम साहबा बिराज रही हैं। चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ है। न कहीं शोर, न कहीं गुल। आजाद ने कहा – जिंदगी का मजा तो ये लोग उठाते हैं।

दोस्त – बेशक, देख कर रश्क आता है।

दोनों आदमी आगे बढ़े। कई छोटे-छोटे टट्टू तेजी से दौड़ते हुए नजर आए। उन पर खूबसूरत काठियाँ कसी हुई थीं और कई लड़के बैठे हुए हँसते-बोलते चले जाते थे। कपड़े सफेद, जैसे बगुले के पर; चेहरे सुर्ख, जैसे गुलाब का फूल। मियाँ आजाद कई मिनट तक उन अंगरेज-लड़कों का उछलना-कूदना देखते रहे। फिर अपने दोस्त से बोले – देखा आपने इस तरह बच्चों की परवरिश होती है। कुछ और आगे बढ़े, तो सौदागरों की बड़ी-बड़ी कोठियाँ दिखाई दी। इतनी ऊँची गोया आसमान से बातें कर रही हैं। दोनों आदमी अंदर गए, तो चीजों की सफाई और सजावट देख कर दंग रह गए। सुभान-अल्लाह! यह कोठी है या शीश-महल। दुनिया भर की चीजें मौजूद। आजाद ने कहा – यह तिजारत की बरकत है। वाह री तिजारत। तेरे कदम धो-धो कर पिए। इतने के सामने से कई बग्घियाँ आईं। सब पर अंगरेज बैठे हुए थे। किसी हिंदुस्तानी का कोसों तक पता ही नहीं। गोया उनके लिए घर से निकलना ही मना है। और आगे बढ़े, तो एक कुतुबखाना नजर आया। लाखों किताबें चुनी हुई, साफ-सुथरी, सुनहरी जिल्दें चढ़ी हुई। आदमी अगर साल भर जम कर बैठे, तो आलिम हो जाय। सुबह से आठ बजे तक लोग आते हैं, अखबार और किताबें पढ़ते हैं और दुनिया के हालात मालूम करते हैं। मगर हिंदुस्तानियों को इन बातों से क्या सरोकार?

दस बजे का वक्त आ गया। अब घर की सूझी। बस्ती में दाखिल हुए। राह में एक अमीर आदमी के मकान के दरवाजे पर दो लड़कों को देखा। नखसिख से तो दुरुस्त हैं; मगर कानों में बाले, भद्दे-भद्दे कड़े पड़े हैं, अँगरखा मैला-कुचैला, पाजामा गंदा, हाथों पर गर्द, मुँह पर खाक, दरवाजे पर नंगे पाँव खड़े हैं। मौलवी साहब ड्योढ़ी में बैठे दो और लड़कों को पढ़ा रहे हें। मगर ड्योढ़ी और पाखाना मिला हुआ है।

मियाँ आजाद – कहिए जनाब, वे टट्टुओं पर दौड़नेवाले अंगरेजों के बच्चे भी याद हैं? इनको देखिए, मैले-गंदे, दिन भर पाखाने का पड़ोस। भला ये कैसे मजबूत और तंदुरुस्त हो सकते हैं? हाँ, जेवर से अलबत्ते लसे हुए हैं! सच तो यह है कि चाहे लड़का जितने जेवर पहने हो, उसको वह सच्ची खुशी नहीं हासिल हो सकती, जो उन प्यारे बच्चों को हवा के झोंकों और टापों की खटपट से मिलती थी। लड़का तड़के गजरदम उठा, हम्माम में गया, साफ-सुथरे कपड़े पहने। यह अच्छा, या अच्छा कि लचके, पट्टे और बिन्नट्ट के कपड़ों में जकड़ दिया जाय, जेवर सिर से पाँव तक लाद दिया जाय और गढ़ैया पर बिठा दिया जाय कि कूड़े के टोकरे गिना करे।

ये बातें हो ही रही थीं कि सात-आठ जवान सामने से गुजरे। अभी उन्नीस ही बरस का सिन है, मगर गालों पर झुर्रियाँ, किसी की कमर झुकी हुई, किसी का चेहरा जर्द। सुर्ख और सफेद रंग धुआँ बन कर उड़ गया। और तुर्रा यह कि अलिफ के नाम वे नहीं जानते। एक नंबर अव्वल के चंडूबाज हैं, दूसरे बला के बातूनी। वह फर्राटे भरें कि भला-चंगा आदमी घनचक्कर हो जाय। एक साहब कॉलेज में तालीम पाते थे, मगर प्रोफेसर से तकरार हो गई, झट मदरसा छोड़ा। दूसरे साहब अपने दाहिने हाथ की दो उँगलियों से बाएँ हाथ पर ताल बजा रहे हैं – धिन ता धिन ता। दो साहब बहादुर नामी बटेर के घट जाने का अफसोस कर रहे हैं। किसी को नाज है कि मैं बाने की कनकइयाँ खूब लड़ाता हूँ, तुक्कल खूब बढ़ाता हूँ।

मियाँ आजाद ने कहा – इन लोगों को देखिए, अपनी जिंदगी किस तरह खराब कर रहे हैं। शरीफों के लड़के हैं, मगर बुरी सोहबत है। पढ़ना-लिखना छोड़ बैठे। अब मटर-गश्ती से काम है। किसी को कलम पकड़ने का शऊर नहीं।

इतने में दो साहब और मिले। तोंद निकाले हुए, मोटे थलथल। आजाद ने कहा – इन दोनों को पहचान रखिए। इन अक्ल के दुश्मनों ने रुपए को दफन कर रखा है। एक के पास दो लाख से ज्यादा हैं ओर दूसरे के पास इससे भी ज्यादा; मगर जमीन के नीचे। बीवी और लड़कों को कुछ जेवर तो बनवा दिए हैं, बाकी अल्लाह-अल्लाह, खैर-सल्लाह! अगर तिजारत करें, तो अपना भी फायदा हो, और दूसरों का भी। मगर यह सीखा ही नहीं। बंगाल-बंक और दिल्ली-बंक तो पहले सुना करते थे, यह जमीन का बंक आज नया सुना।

दोनों आदमी घर पहुँचे। खाना खा कर लेटे। शाम को फिर सैर करने की सूझी एक बाग में जा पहुँचे। कई आदमी बैठे हुक्के उड़ाते थे और किसी बात पर बहस करते थे। बहस से तकरार शुरू हुई। मिर्जा सईद ने कहा – भई, कलजुग है, कलजुग। इसमें जो न हो, वह थोड़ा। अब पुराने रस्मों को लोग दकियानूसी बताते हैं, शादी-ब्याह के खर्च को फिजूल कहते हैं। बच्चों को जेवर पहनाना गाली है। अब कोई इन लोगों से इतना तो पूछे कि जो रस्म बाप-दादों के वक्त से चली आती हे, उसको कोई क्योंकर मिटाए?

यकायक पूरब की तरफ से शोर-गुल की आवाज सुनाई दी। किसी ने कहा, चोर आया, लेना, जाने न पाए। कोई बोला, साँप है। कोई भेड़िया-भेड़िया चिल्ला उठा। किसी को शक हुआ कि आग लगी। सबके सब भड़भड़ा कर खड़े हुए, तो चोर न चकार, भेड़िया न सियार। एक मियाँ साहब लँगोट कसे लठ हाथ में लिए अकड़ खड़े हैं, और उनसे दस कदम के फासले पर कोई लाला जी बाँस की खपाच लिए डटे खड़े हैं। इर्द-गिर्द तमाशाइयों की भीड़ है। इधर मियाँ साहब पैतरे बदल रहे हैं, उधर लाल उँगलियाँ मटका-मटका कर गुल मचा रहे हैं। मिर्जा सईद ने पूछा – मियाँ साहब, खैर तो है? मियाँ – क्या अर्ज करूँ मिर्जा साहब, आपको दिल्लगी सूझती है और यहाँ जान पर बन गई है। यह लाला मेरे पड़ोसी हैं। इनका कायदा है कि ठर्रा पी कर हजारों गालियाँ मुझे दिया करते हैं। आज कोठे पर चढ़ कर खुदा के वास्ते लाखों बातें सुनाईं। अब फरमाइए, आदमी कहाँ तक जब्त करे? लाख समझाया कि भाई, आदमी से ऊँट और इनसान से बेदुम के गधे न बन जाओ, मगर यह बादशाह की नहीं सुनते, मैं किस गिनती में हूँ। ताल ठोक कर लड़ने को तैयार हो गए। खुदा न करे, किसी भलेमानस को अनपढ़ से साबिका पड़े।

लाला – और सुनिएगा,हम चार-पाँच बरस लखनऊ में रहे, अनपढ़ ही रहे। मियाँ-बारह बरस दिल्ली में रह कर तुमने क्या सीख लिया, जो अब चार बरस लखनऊ में रहने से फाजिल हो गए।

लाला – यह साठ बरस से हमारे पड़ोसी हैं, खूब जानते हैं कि बरस दिन का त्योहार है; हम शराब जरूर पिएँगे; चुस्की जरूर लगाएँगे, नशे में गालियाँ जरूर सुनाएँगे। अब अगर कोई कहे, शराब-कलिया छोड़ दो, तो हम अपनी पुरानी रस्म को क्योंकर छोड़ें?

मिर्जा सईद – अजी लाला साहब, बहुत बहकी-बहकी बातें न कीजिए। हमने माना कि पुरानी रस्म है, मगर ऐसी रस्म पर तीन हरफ! आप देखें तो कि इस वक्त आपकी क्या हालत है? कीचड़ में लतपत, सिर-पैर की खबर नहीं, भलेमानसों को गालियाँ देते हों और कहते हो कि यह तो हमारी रस्म है।

आजाद – मिर्जा सईद, जरा मुझसे तो आँखें मिलाइए। शर्माए तो न होंगे? अभी तो आप कहते थे कि पुरानी रस्म को कोई क्योंकर मिटाए। यह भी तो लाला जी की पुरानी रस्म है; जिस तरह होती आई है, उसी तरह अब भी होगी। यह धूप-छाँह की रंगत आपने कहाँ पाई? गिरगिट की तरह रंग क्यों बदलने लगे? जनाब, बुरी रस्म का मानना हिमाकत की निशानी है।

मिर्जा सईद बगलें झाँकने लगे। आजाद और उनके दोस्त और आगे बढ़े, तो देखते क्या हें कि एक गँवार औरत रोती चली जाती है, और एक मर्द चुपके-चुपके समझा रहा है – चुपाई मार, चुपाई मार। मियाँ आजाद समझे, कोई बदमाश है। ललकारा, कौन है बे तू, इस औरत को कहाँ भगाए लिए जाता है? उस गँवार ने कहा – साहब, भगाए नहीं लिए जात हौं; यो हमार मिहरिया आय, हमरे इहाँ रसम है कि जब मिहरिया मइका से ससुराल जात हे, तो दुइ-तीन कोस लौं रोवत है।

सईद – वल्लाह, मैं कुछ और ही समझा था। खुदा की पनाह, रस्म की मिट्टी खराब कर दी।

आजाद – बजा है, अभी आप उस बाग में क्या कह रहे थे? बात यह है कि पढ़े-लिखे आदमियों को बुरी रस्मों का मानना मुनासिब नहीं। यह क्या जरूरी है कि अक्ल की आँखों को पाकेट में बंद करके पुरानी रस्मों के ढर्रे पर चलना शुरू करें; और इतनी ठोकरें खायँ कि कदम-कदम पर मुँह के बल गिरें। खुदा ने अक्ल इसलिए नहीं दी कि पुरानी रस्मों में सुधार न करें, बल्कि इसलिए कि जमाने के मुताकि अदल-बदल करते रहें। अगर पुरानी बातों की पूरी-पूरी पैरवी की जाती, तो ये जामदानी के कुरते और शरबती के अँगरखे नजर न आते। लोग नंगे फिरते होते। पुलाव और कबाब के बदले हम पाढ़े और हिरन का कच्चा गोश्त खाते होते। खुदा ने आँखें दी हैं; मगर अफसोस कि हमने बंद कर लीं।

मिर्जा सईद – तो आप नाच-रंग के जलसों के भी दुश्मन होंगे? आप कहेंगे कि यह भी बुरी रस्म है?

आजाद – बेशक बुरी रस्म है। मैं उसका दुश्मन तो नहीं हूँ, मगर खुदा ने चाहा, तो बहुत जल्द हो जाऊँगा। यह कितनी बेहूदा बात है कि हम लोग औरतों को रुपए का लालच देकर इस तरह जलील करते हैं।

मिर्जा सईद – तो यह कहिए कि आप कोरे मुल्ला हैं। यह समझ लीजिए कि इन हसीनों का दम गनीमत है। दुनिया की चहल-पहल उनके दम से, महफिल की रौनक उनके कदम से। यहाँ तो जब तक तबले की गमक न हो, चाँद से मुखड़े की झलक न हो, कड़ों की झनकार न हो, छड़ों की छनकार न हो, छमाछम की आवाज न आए, कमरा न सजे, ताल न बजे, धमा-चौकड़ी न मचे, मेहँदी न रचें, रँगरलियाँ न मनाएँ, शादियाने न बजाएँ, आवाजें न करें, इत्र में न बसें, ताने न सुनें, सिर न धुनें, गलेबाजी न हो, आँखों में लाल डोरे न हों, शराब-कबाब न हो, परियाँ बुलबुल की तरह चहकती न हों, सेवती के फूल और हिना की टट्टियाँ महकती न हों, कहकहे न हों, चहचहे न हों, तो किस गौखे का दम भर जीने को जी चाहे? वल्लाह, महफिल बावले कुत्ते की तरह काट खाय –

महफिल में गुदगुदाती हो, शोखी निगाह की;
शीशों से आ रही हो, सदा वाह-वाह की।

इधर जामेमुल (शराब) हो, उधर सुराही की कुल-कुल हो, इधर गुल हो, उधर बुलबुल हो, महफिल का रंग खूब जमा हो, समाँ बँधा हो, फिर जो आपकी गरदन भी न हिल जाय, तो झुक कर सलाम कर लूँ। अब गौर फरमाइए कि ऐसे तायफे को, जो डिबिया में बंद कर रखने काबिल है, आप एक कलम मिटा देना चाहते हैं?

आजाद – जनाब, आपको अपनी तवायफें मुबारक हों। यहाँ इस फेर में नहीं पड़ते।

ये बातें करते हुए लोग और आगे बढ़े, तो क्या देखते हैं कि मस्त हाथी पर एक महंत जी सवार, गेरुए कपड़े पहने, भभूत रमाए, पालथी मारे, बड़े ठाठ से बैठे हैं। चेले-चापड़ साथ हैं। कोई घोड़े की पीठ पर सवार, कोई पैदल। कोई पीछे बैठा मुरछल हिलाता है, कोई नरसिंघा बजाता है। आजाद बोले- कोई इन महंत जी से पूछे कि आप खुदा की इबादत करते हैं, या दुनिया के मजे उड़ाते हैं? आपको इस टीम-टाम से क्या मतलब?

मिर्जा सईद – कुछ बाप की कमाई तो है नहीं, अहमकों ने जागीरें दे दीं, महंत बना दिया। अब ये मौजें करते हैं।

आजाद – जागीर देने वालों को क्या मालूम था कि उनके बाद महंत लोग यों गुलछर्रे उड़ाएँगे? यह तो हमारा काम है कि इन महंतों की गरदन पकड़ें, और कहें, उतर हाथी से, ले हाथ में कमंडल।

यकायक किसी ने छींक दिया। सईद बोले – हात्तेरे छींकनेवाले नाक का टूँ। यार, जरा ठहर जाओ, छींकते चलना बदशगुनी है।

आजाद – तो जनाब, हमारा और आपका साथ हो चुका। यहाँ छींक की परवा नहीं करते। आप पर कोई आफत आए, तो हमारा जिम्मा।

अभी दस कदम भी न गए थे कि बिल्ली रास्ता काट गई। सईद ने आजाद का हाथ पकड़ कर अपनी तरफ खींच लिया। भई अजब बेतुके आदमी हो, बिल्ली राह काट गई और तुम सीधे चले जाते हो? जरा ठहरो, पहले कोई और जाय, तब हम भी चलें।

अब सुनिए कि आध घंटे तक मुँह खोले खड़े हैं। या खुदा, कोई इधर से आए। आजाद ने झल्ला कर कहा – भई, हमको आपका साथ अजीरन हो गया। यहाँ इन बातों के कायल नहीं। खैर वहाँ से खुदा-खुदा करके चले, तो थोड़ी देर के बाद सईद ने फिर आजाद को रोका। हाँय-हाँय, खुदा के वास्ते उधर से न जाना। मियाँ अंधे हो, देखते नहीं, गधे खड़े हैं। आजाद ने कहा – गधे तो आप खुद हैं। डंडा उठाया, तो दोनों गधे भागे। फिर जो आगे बढ़े, तो सईद की बाईं आँख फड़की। गजब ही हो गया। हाथ-पाँव फूल गए, सारी चौकड़ी भूल गए। बोले – यार, कोई तदबीर बताओ, बाईं आँख बेतरह फड़क रही है। मर्द की बाईं और औरत की दाहनी आँख का फड़कना बुरा शगून है। आजाद खिलखिला कर हँस पड़े कि अजीब आदमी हैं आप! छींक हुई और हवास गायब; बिल्ली ने रास्ता काटा, और होश पैतरे; गधे देखे और औसान खता; और जो बाईं आँख फड़की, तो सितम ही हुआ! मियाँ, कहना मानो, इन खुराफात बातों में न जाओ। यह वहम है, जिसकी दवा लुकमान के पास भी नहीं। मेरा और आपका साथ हो चुका। आप अपना रास्ता लीजिए, बंदा रुखसत होता है।

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