अनुवाद – आजाद-कथा – भाग 10– (लेखक – रतननाथ सरशार, अनुवादक – प्रेमचंद)

· June 19, 2012

Premchand_4_aवसंत के दिन आए। आजाद को कोई फिक्र तो थी ही नहीं, सोचे, आज वसंत की बहार देखनी चाहिए। घर से निकल खड़े हुए, तो देखा कि हर चीज जर्द है, पेड़-पत्ते जर्द, दरो-दीवार जर्द, रंगीन कमरे जर्द, लिबास जर्द, कपड़े जर्द। शाहमीना की दरगाह में धूम है, तमाशाइयों का हुजूम है। हसीनों के झमकड़ें, रँगीले जवानों की रेल-पेल, इंद्र के अखाड़े की परियों का दगल है, जंगल में मंगल है। वसंत की बहार उमंग पर है, जाफरानी दुपट्टों और केसरिये पाजामों पर अजब जोबन है। वहाँ से चौक पहुँचे। जौहरियों की दुकान पर ऐसे सुंदर पुखराज हैं कि पुखराज-परी देखती, तो मारे शर्म के हीरा खाती और इंद्र का अखाड़ा भूल जाती। मेवा बेचनेवाली जर्द आलू, नारंगी, अमरूद, चकोतरा, महताबी की बहार दिखलाती है, चंपई दुपट्टे पर इतराती है। मालिन गेंदा, हजारा, जर्द गुलाब की बू-बास से दिल खुश करती है। और पुकार-पुकार कर लुभाती है, गेंदे का हार है, गले की बहार है। हलवाई खोपड़े की जर्द बर्फी, पिस्ते की बर्फी, नानखताई, बेसन के लड्डू, चने के लड्डू दुकान पर सजाए बैठा है। खोंचेवाले पापड़, दालमोट, सेव वगैरह बेचते फिरते हैं। आजाद यही बहार देखते, दिल बहलाते चले जाते थे। देखते क्या हैं, लाला वसंतराय के मकान में कई रँगीले जवान बाँकी टोपियाँ जमाए, वसंती पगिया बाँधे, केसरिये कपड़े पहने बैठे हैं। उनके सामने चंद्रमुखी औरतें बैठी नौबहार की धुन में बसंत गा रही हैं। कालीन जर्द है, छतपोश जर्द, कंबल जर्द, जर्द झालर से मकान सजाया है, वसंत-पंचमी ने दरो-दीवार तक को वसंती लिबास पहनाया है। कोई यह गीत गाती है –

ऋतु आई वसंत अजब बहार;
खिले जर्द फूल बिरवों की डार।
चटक्यो कुसुम, फूलै लागी सरसों;
झूमत चलत गेहूँ की बार
हर के द्वारे माली का छोहरा;
गरबा डारत गेंदों के हार।
टेसू फूले, अंबा बौरे;
चंपा के रुख कलियन की बहार।
गरबा डारे उस्ताद के द्वारे;
चलो सब सखियाँ कर-कर सिंगार।

कोई मियाँ अमानत की यह गजल गाती है –

है जलवाए तन से दरो-दीवार बसंती;
पोशाक जो पहने है मेरा यार बसंती।
क्या फस्ले बहारी में शिगूफे हें खिलाए;
माशूक हैं फिरते सरे-बाजार बसंती।
गेंदा है खिला बाग में, मैदान में सरसों;
सहरा वह बसंती है, यह गुलजार बसंती।
मुँह जर्द दुपट्टे के न आँचल से छिपाओ;
हो जाय न रंगे गुले-रुखसार बसंती।

आजाद चले जाते थे कि एक नई सज-धज के बुजुर्ग से मुठभेड़ हुई। बड़े तजुर्बेकार, खर्राट आदमी थे। आजाद को देखते ही बोले – आइए-आइए खूब मिले। वल्लाह, शरीफ की सूरत पर आशिक हूँ। चीन, माचीन, हिंद और सिंध, रूम और शाम, अलगरज, सारी खुदाई की बंदे ने खाक छानी है, और तू यार जानी है। सफर का हाल सुन, घुँघरू बोले छुन-छुन। ऐसी बात सुनाऊँ, परी को लुभाऊँ, जिन को रिझाऊँ, मिसर की दास्तान सुनाऊँ।

यह तकरीर सुन कर आजाद के होश पैतरे हो गए, समझ में न आया, कोई पागल है, या पहुँचा हुआ फकीर। मगर आसार तो दीवानेपन के ही हैं।

खुर्राट ने फिर बड़-बड़ाना शुरू किया – सुनो यार, कहता है खाकसार, हम सो रहें तुम जागो, फिर हम उठ बैठे, तुम सो रहो, सफर यार का है, सोते-जागते राह काटें, सफर का अंधा कुआँ उन्हीं ईंटों से पाटें।

यह कह कर खुर्राट ने एक खोंचेवाले को बुलाया और पूछा – खुटियाँ कितने सेर? बर्फी का क्या भाव? लड्डू पैसे के कै? बोलो झटपट, नहीं हम जाते हैं। खोंचेवाले ने समझा, कोई दीवाना है। बोला – पैसे भी हैं या भाव ही से पेट भरोगे?

खुर्राट – पैसे नहीं है, तो क्या मुफ्त माँगते हैं? तौल दे सेर भर मिठाई।

मिठाई ले कर आजाद को जिद करके खिलाई, ठंडा पानी पिलवाया और बोले – शाम हुई, अब सो रहो, हम असबाब ताकते हैं। मियाँ आजाद एक दरख्त के नीचे लेटे, खुर्राट ने ऐसी मीठी-मीठी बातें कीं कि उन्हें उस पर यकीन आ गया। दिन भर के थके थे ही, लेटते ही नींद आ गई। सोए तो घोड़े बेच कर, सिर-पैर की खबर नहीं, गोया मुर्दों से शर्त लगाई है। वह एक काइयाँ, दुनिया भर का न्यारिया, उनको गाफिल पाया, तो घड़ी सोने की चेन, चाँदी की मूठवाली छड़ी, चाँदी का गिलौरीदान ले कर चलता हुआ। आध घंटे में आजाद की नींद खुली, तो देखा कि खुर्राट गायब है, घड़ी और चेन, डब्बा और छड़ी भी गायब। चिल्लाने लगे – लूट लिया, जालिम ने लूट लिया। झाँसा दे गया। ऐसा चकमा कभी न खाया। दौड़ कर थाने में इत्तला की। मगर खुर्राट कहाँ, वह तो यहाँ से दस कोस पर था। बेचारे रो-पीट कर बैठ रहे। थोड़ी ही दूर गए होंगे कि एक चौराहे पर एक जवान को मुश्की घोड़े पर सवार आते देखा। घोड़ा ऐसा सरपट जा रहा था कि हवा उसकी गर्द तक को न पहुँचती थी। अँधेरा हो ही गया था, एक कोने में दबक रहे कि ऐसा न हो, कहीं झपेटे में आ जायँ। इतने में सवार उनके सिर पर आ खड़ा हुआ। झट घोड़े की बाग रोकी और इनकी तरफ नजर भर कर देखने लगा। यह चकराए, माजरा क्या है? यह तो बेतरह घूर रहा है, कहीं हंटर तो न देगा।

जवान – क्यों हजरत, आप किसी को पहचानते भी हैं? खुदा की शान, आप और हमको भूल जायँ!

आजाद – मियाँ, तुमको धोखा हुआ होगा। मैंने तो कभी तुम्हारी सूरत भी नहीं देखी।

जवान – लेकिन मैंने तो आपकी सूरत देखी है; और आपको पहचानता हूँ। क्या इतनी जल्दी भूल गए? यह कह कर वह जवान घोड़े से उतर पड़ा और आजाद से चिमट गया।

आजाद – आपको सचमुच धोखा हुआ।

जवान – भाई, बड़े भुलक्कड़ हो! याद करो, कॉलेज में हम-तुम, दोनों एक ही दर्जे में पढ़ते थे। वह किश्ती पर हवा खाने जाना और दरिया के मजे उड़ाना; वह मदारी खोंचेवाला, वह उकलैदिस के वक्त उड़ भागना; सब भूल गए? अब मियाँ आजाद को याद आई। दोस्त के गले से लिपट गए और मारे खुशी के रो दिए।

जवान – तुम्हें याद होगा, जब मैं इंटरमीडिएट का इम्तिहान देने को था, तो मेरे पास फीस का भी ठिकाना न था। रुपए की तलाश में इधर-उधर भटकता फिरता था कि राह में अस्पताल के पास तालाब पर तुमसे मुलाकात हुई और तुमने मेरे हाल पर रहम करके मुझे रुपए दिए। तुम्हारी मदद से मैंने बी.ए. तक पढ़ा। लेकिन इस वक्त तुम बड़े उदास नजर आते हो, इसका क्या सबब है?

आजाद – यार, कुछ न पूछो। एक खुर्राट के चकमे में आ गया। यहीं घास पर लेट रहा, और वह मेरी घड़ी-चेन वगैरह ले कर चलता हुआ!

जवान – भई वाह! इतने घाघ बनते हो, और एक खुर्राट के भर्रे में आ गए! आप के बटन तक उतार ले गया और आप को खबर नहीं। ले अब कान पकड़िए कि अब फिर किसी मुसाफिर की दोस्ती का एतबार न करेंगे। मिठाई तो आप खा ही चुके हैं, चलिए, कहीं बैठ कर वसंती गाना सुनें।

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