अधूरी कथा

· April 17, 2013

bitiaउत्पलदेव ने कहा, मेरी बेटी का विवाह उज्जयिनी के राजकुमार से हो, इससे बढ़कर मेरे लिए प्रसन्नता की और क्या बात हो सकती है,

पर मैंने भी बेटी के विवाह के विषय में एक प्रतिज्ञा कर रखी है। दूतों ने पूछा, आपकी प्रतिज्ञा क्या है? उत्पलदेव ने कहा, जो मेरे घर में लाकर नगर के अठारह हजार ब्राह्मणों को भोजन कराएगा, उसे मैं अपनी बेटी दूँगा। यह मेरी प्रतिज्ञा है। दूतों ने आकर उत्पलदेव की शर्त महाराज पालक को बतायी। तब महाराज पालक ने उज्जयिनी के सब ब्राह्मणों को बुलाकर कहा, मेरी आज्ञा है कि आप लोग सब के सब जाकर चाण्डाल उत्पलदेव के घर भोजन करें। यदि आप ऐसा नहीं करेंगे, तो अच्छा न होगा।

उज्जयिनी के सारे ब्राह्मण राजा की यह बात सुनकर घबरा गये। वे राजा के क्रोध से भी डरते थे और चाण्डाल के घर भोजन करने से धर्म की हानि होने से भी। तब वे सबके सब महाकाल के मन्दिर में गये और महाकाल से प्रार्थना करने लगे कि भगवन्, हमें इस संकट से बचाइए। तब महाकाल ने उन्हें दर्शन देकर कहा, तुम सब लोग चाण्डालराज उत्पलदेव के घर बेखटके भोजन करो, वह तो पिछले जन्म का विद्याधर है। भगवान महाकाल का आदेश मानकर उन सब ब्राह्मणों ने चाण्डाल उत्पलदेव के घर भोजन किया।

उसके पश्चात सुरतमंजरी का राजकुमार अवन्तिवर्धन के साथ धूमधाम से विवाह किया गया। जिस तरह पाँचों पाण्डवों तथा द्रौपदी ने महाभारत युद्ध के बाद हिमालय पर जाकर अपने देह त्यागे थे, उसी प्रकार महाराज उदयन, उनकी दोनों रानियों तथा मन्त्रियों ने संसार से विरक्त होकर राजपाट और ऐश्वर्य का त्याग कर कालंजर पर्वत पर जाकर अपने देह त्याग दिये। नरवाहनदत्त पर अपने पिता और माताओं के महाप्रयाण के समाचार से जैसे वज्रपात हुआ।

फिर गोमुख आदि मन्त्रियों के समझाने-बुझाने पर उसने धैर्यपूर्वक उन सबके और्ध्वदैहिक कृत्य निपटाये। इसके बाद नरवाहनदत्त अनन्तकाल तक विद्याधरों पर एकच्छत्र राज्य करता रहा। उसी नरवाहनदत्त को लेकर रचा गया कथाओं का यह विराट ताना-बाना गुणाढ्य ने लेखबद्ध किया।

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